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| ...:::: Hindi Shayari ::::.... |
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...:::: Hindi
Shayari SMS ::::.... Anjane me bhi kabhi saccha pyar mil jata hai,
बे-ज़मीं
लोगों को..
बे-करार आंखों को.. बद-नसीब कदमों को.. जिस तरफ़ भी ले जायें.. रास्तों की मर्ज़ी है.. बे-निशां जज़ीरों पर.. बद-गुमा शहरों में.. बे-ज़ुबां मुसाफ़िर को.. जिस तरफ़ भी भटकायें.. रस्तों की मर्ज़ी है.. रोक लें या बढने दें.. थाम लें या गिरने दें.. वस्ल की लकीरों को.. तोड दें या मिलने दें.. रास्तों की मर्ज़ी है.. अजनबी कोई लाकर.. हमसफ़र बना डालें.. साथ चलने वालों की.. राह जुदा बना डालें.. या मुसाफ़तें सारी.. खाक मे मिला डालें.. रास्तों की मर्ज़ी है..
ishq main jo duba , usne khuda pa liya.
thi talash khuda ki, bande ko khuda banaa liya. agar chala na buss toh ishq ko sar per chada liya phir kisi begane ko dil ka devta bana liya uski yaad mein apna har ek katra baha diya phir bhi na janey kyu unko yaad karke ye dil aaj phir muskura diya ye dil phir muskura diya...................
Ishq Mein Hum Tumhe
Kya Batayein
Iss kadar Chot Khaye Hue Hain, Mout Ne Humko Mara Hai Or Hum ZINDAGI Ke Sataye Hue Hain!!
hum toh hai
diwaane tumko bhi bana denge
apne ishq ki shamma har dil mein jaga denge mano ya mano tum ye tumhari marzi per hume tumhe hamari yaad mein , SHAYARI karna toh seekha denge
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में, हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा, आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा? फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में, क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी, जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा, जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी, जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला, जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था, मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी, जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी, उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी, जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा, उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे, क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है, यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी; अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया, वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको, जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया, यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली, जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला। जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ, है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है, कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे, प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है, मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का। पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा - नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले, अनवरत समय की चक्की चलती जाती है, मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं, कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है, ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के इस एक और पहलू से होकर निकल चला। जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। कभी कभी
बहूत सुकून देति है
ये शीशे
ये सपने ये रिश्ते ये धागे
किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का लगाये हैं हम ने भी सपनों के पौधे मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से रवायत है शायद ये सदियों पुरानी शिकायत नहीं है कोई ज़िन्दगी से
कुछ फ़ासले
बनाये रखना
मिल मिल के
बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते? जब
कोई ख्याल दिल से टकराता है ॥ शाम है
हँसकर बिता लीजिये
होता कैसे उन्हें गम हमारी
रुसवाई का.... एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्जाम नहीं
अक्सर रिश्तों को रोते हुए देखा है,
अपनों की ही बाँहो में मरते हुए देखा है टूटते, बिखरते, सिसकते, कसकते रिश्तों का इतिहास, दिल पे लिखा है बेहिसाब! प्यार की आँच में पक कर पक्के होते जो, वे कब कौन सी आग में झुलसते चले जाते हैं, झुलसते चले जाते हैं और राख हो जाते हैं! क्या वे नियति से नियत घड़ियाँ लिखा कर लाते हैं? कौन सी कमी कहाँ रह जाती है कि वे अस्तित्वहीन हो जाते हैं, या एक अरसे की पूर्ण जिन्दगी जी कर, वे अपने अन्तिम मुकाम पर पहुँच जाते हैं! मैंने देखे हैं कुछ रिश्ते धन-दौलत पे टिके होते हैं, कुछ चालबाजों से लुटे होते हैं-गहरा धोखा खाए होते हैं कुछ आँसुओं से खारे और नम हुए होते हैं, कुछ रिश्ते अभावों में पले होते हैं- पर भावों से भरे होते है! बड़े ही खरे होते हैं ! कुछ रिश्ते, रिश्तों की कब्र पर बने होते हैं, जो कभी पनपते नहीं, बहुत समय तक जीते नहीं दुर्भाग्य और दुखों के तूफान से बचते नहीं! स्वार्थ पर बनें रिश्ते बुलबुले की तरह उठते हैं कुछ देर बने रहते हैं और गायब हो जाते हैं; कुछ रिश्ते दूरियों में ओझल हो जाते हैं, जाने वाले के साथ दूर चले जाते हैं ! कुछ नजदीकियों की भेंट चढ़ जाते हैं, कुछ शक से सुन्न हो जाते हैं ! कुछ अतिविश्वास की बलि चढ़ जाते हैं! फिर भी रिश्ते बनते हैं, बिगड़ते हैं, जीते हैं, मरते हैं, लड़खड़ाते हैं, लंगड़ाते हैं तेरे मेरे उसके द्वारा घसीटे जाते हैं, कभी रस्मों की बैसाखी पे चलाए जाते हैं! पर कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं जो जन्म से लेकर बचपन जवानी - बुढ़ापे से गुजरते हुए, बड़ी गरिमा से जीते हुए महान महिमाय हो जाते हैं ! ऐसे रिश्ते सदियों में नजर आते हैं ! जब कभी सच्चा रिश्ता नजर आया है कृष्ण की बाँसुरी ने गीत गुनगुनाया है! आसमां में ईद का चाँद मुस्कराया है! या सूरज रात में ही निकल आया है! ईद का चाँद रोज नहीं दिखता, इन्द्रधनुष भी कभी-कभी खिलता है! इसलिए शायद - प्यारा खरा रिश्ता सदियों में दिखता है, मुश्किल से मिलता है पर, दिखता है, मिलता है, यही क्या कम है .. !!!
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